— माँ हनुमंता धाम / स्थापना
भक्ति के
संकल्प से,
दिव्य धाम तक।

गुरु जी — माँ हनुमंता धाम के प्रेरणा स्रोत
माँ हनुमंता धाम की स्थापना एक दिव्य संकल्प का परिणाम है। यह स्थान केवल ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और गुरु जी के मार्गदर्शन से निर्मित हुआ है।
"जहाँ श्रद्धा का वास है, वहीं साक्षात ईश्वर का निवास है।"
वर्षों की तपस्या और प्राण प्रतिष्ठा के महायज्ञ के बाद, आज यह धाम लाखों भक्तों के लिए शांति और प्रेरणा का केंद्र बन चुका है। यहाँ की हर ईंट गुरु जी के आशीर्वाद की साक्षी है।
हमारा उद्देश्य इस धाम के माध्यम से सनातन संस्कृति और भक्ति के मार्ग को जन-जन तक पहुँचाना है। दर्शन और सेवा के लिए आप सदैव आमंत्रित हैं।
1 — जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
मेरा जन्म 1961 में ग्राम छुल्ला (गढ़ाकोटा) में हुआ था। सन् 1972 में मैं कक्षा 5वीं पढ़ता था। रामसेवक विश्वकर्मा मासाब 5वीं में पढ़ाते थे।
मासाब की दिनचर्या विलक्षण थी। ब्रम्ह मुहूर्त में कुँआ पर स्नान करने जाते थे और साथ में हमें भी ले जाते और फूल, दूर्वा, तोड़कर देते, और साथ में पूजा करते थे।
मासाब श्री श्री श्री 1008 परमहंस दादा के भक्त थे। सदैव परमहंस दादा की सेवा में रत रहते थे। परमहंस दादा हमें बहुत चाहते थे।
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दादा का आशीर्वाद साथ में है। ग्राम रोन में दादा की समाधी मंदिर है। दादा की विलक्षण कृपा की अनुभूति आज भी होती है।
2 — माता रानी की कृपा
जब मैं जन्म स्थान ग्राम छुल्ला में कक्षा छठवीं पढ़ता था। हमारे घर में ठाकुर बब्बा रहते थे वे मजदूरी करते थे।
चैत्र की नवदुर्गा में ग्रामवासियों, भक्तजनों के जवारे, खप्पर लगाते थे। नवमी के दिन पंडा के साथ खप्पर जवारे लेकर माताजी के यहाँ आये।
यहाँ पर एक इमली का वृक्ष, एक विकूत चबूतरा पर बैठी माँ हनुमंता माता, चारों तरफ पुंआर लगा हुआ था, निर्जन स्थान 03 कि0मी0 आसपास तक कोई गाँव नहीं है निकटतम ग्राम डेढ़ किलोमीटर दूर खारोतला है।
ग्राम रोन-कुमरई, छुल्ला, मढ़िया, सेवास, फुलर, ऊटखेरा, कैकरा, मढ़िया बहुत से गाँव से जवारे भक्तें आती थीं।
पानी का साधन नहीं था। एक छोटा तालाब और कुमरई ग्राम के बठा परिवार के दादा ने मांगकर कुआँ बनवाया था वही साधन था।
यहाँ कोई चलो शब्द नहीं कहता था। बहुत से लोह के बाने, स्थान निर्जन भयभीत करने वाला था।
जवारे खप्पर माँ को चढ़ाया कुछ भक्तों को भाव आने लगे और झूमने लगे। भय कारण मैंने वहाँ से घर आने के लिए खेतों में दौड़ लगा दी।
बीच रास्ते में अधिक प्यास के कारण मूर्छित हो गया, जब होश आया तब एक कन्या सिर पर लाल कपड़ा बाँधे खप्पर में जल लिये मुझे पानी पिला रही थी और मुस्कराते हुए कहा ऐसे डरकर दौड़ नहीं लगाते। अकेले नहीं जाना चाहिए चलो हम छोड़ देते हैं।
प्रसादी भी खिलाया थोड़ी दूर साथ में वह कन्या आई। गाँव के निकट जब आदमी दिखने लगे हमें अच्छा लगने लगा और जब पीछे मुड़कर देखा उस कन्या का दर्शन नहीं हुआ।
बस यहीं से देवी माँ के चरणों में जुड़ने की शुरूआत हुई।
जब घर पर सबको यह घटना बताई तो मेरी माँ ने कहा कि बेटा वह कन्या ही मातारानी थी।
बस मेरा अनुराग माता रानी के प्रति बढ़ा और घर में आत्म चिन्तन करने लगा।
बस क्या था, माता रानी के प्रति सेवा भक्ति की लगनशीलता बढ़ने लगी।
हर त्यौहार दशहरा, दीपावली को जाकर चबूतरा की साफ-सफाई, लिपाई पुताई किया करता था।
इस कार्य में हमारे सहयोगी सखा श्रीराम राय एवं लखन राय, बम्बू दादा सेवाभाव रखते थे।
कक्षा 7वीं से हर दीपावली को रात्री में पूजन करते थे और स्थान पर रात्रि में ठहर जाते थे। वह आज भी नियम है।
बहुत से आदमी कहने लगे कि इस बालक का दिमाग खराब हो जावेगा। जब देखो तब, अकेला माता जी के यहाँ इमली वृक्ष के नीचे बैठा रहता है।
शिक्षा और माता रानी की कृपा
छुल्ला ग्राम में कक्षा आठवीं पास की और आगे पढ़ने के लिए दमोह चला गया। सप्ताह में एक बार साईकिल से दर्शन करने आता था।
कक्षा 10वीं में माता रानी का पंचक, आरती, प्रार्थना मन अनुरूप रचना की।
कक्षा 11वीं गणित विषय से परीक्षा पास की और उसके बाद मन नहीं लगा घर पर ही आकर स्नातक (बी.ए) की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।
शिक्षक बनने की यात्रा
वर्ष 1984 में मिनी पी.एस.सी. परीक्षा का फार्म भरा और शिक्षक बनने की परीक्षा दी और दिनांक 01.12.1986 को परका सिमरिया में नियुक्ति आदेश प्राप्त हुआ।
माता रानी की कृपा से हमारी नौकरी लग गई।
नौकरी के वेतन का मासिक 20 प्रतिशत की राशि माता की सेवा में समर्पित थी।
मन में एक प्रेरणा जागृत हुई कि यहाँ पर एक मंदिर बने प्रतिदिन झालर, शंख बजे नियमित पूजा हो, यह हमारा जीवन का लक्ष्य था।
और हमने चैत्र की नवदुर्गा दशमी के दिन माँ के चबूतरा के समक्ष प्रतिज्ञा की।
बहुत से दर्शनार्थी थे भक्तें हो रही थी सभी ने रोका की टगर पर यह कार्य असंभव है।
पर हमने खड़े होकर कह दिया जब तक मंदिर का निर्माण नूतन प्राण प्रतिष्ठा नही होगी तब तक भोजन का परित्याग रहेगा।
मंदिर निर्माण का संकल्प
इसी बीच समय का चक्र चला।
हमारे पिताजी संस्कृत आचार्य थे और श्रीमद्भागवत के मार्मिक विद्वान पं. भवानी शंकर पौराणिक छुल्ला वाले पंडित जी के नाम से जाने जाते थे।
हमारे पिताजी ने मातारानी का संस्कृत में स्त्रोत की रचना की।
पिताजी ने मंदिर निर्माण में मदद की और मेरा आत्मबल बढ़ाया।
कुछ निकटतम ग्रामवासियों ने आर्थिक मदद की। बस फिर क्या था, कार्य निर्माण की रूपरेखा बनाई।
हमारी प्रतिज्ञा में सम्मिलित श्री वृजमोन कम्पोन्डर बाबू ने एक माह तक भोजन नहीं किया। अनुरोध करने पर कम्पोण्डर बाबू ने भोजन किया।
हमारा उपवास प्रतिज्ञाबद्ध चलता रहा।
हमारे पास बजाज-50 गाड़ी थी।
हम दोनों रामों में गये ग्राम खारोतला से 2700 रू0, सेवास से 360 रू0, कुमरई से 480 रू0, छुल्ला से 265 रू0, बांसा से 680 रू0 प्राप्त हुआ।
वाहन ईधन अधिक व्यय होने से आना जाना बंद कर दिया। अब सब कुछ माताजी पर छोड़ दिया।
ग्राम खारोतला राशि 2700 रू0 वर्तमान जिला पंचायत सदस्य संतोष पटैल के पिताश्री मल्ले पटैल के साथ सामग्री क्रय करने गढ़ाकोटा गये और प्राचीन स्थान चबूतरा पर कुछ खुदाई शुरू की ही थी कि एक और धर्मसंकट उत्पन्न हुआ।
मंदिर निर्माण — श्री जगत पटैल का संकल्प
श्री जगत पटैल ग्राम सेवास के पिताजी आये और कहने लगे बेटा तुम्हारे परिवार से पारिवारिक संबंध है, मंदिर निर्माण को रोक नहीं रहे पर बेटा तुम्हारा भाई जगत के जन्म में बोल दिया था कि हे माता हमारे यहाँ एक बच्चा हो जाए तो हम तुम्हारे स्थान पर मठ मन्दिर बनवा देंगे पर हमारी गलती हुई कि अब बच्चे की शादी होने के बाद भी मंदिर नहीं बनवा पाया।
हमारी बोलना बदना है तो हमने कहा मिलकर मंदिर बना लेंगे।
उन्होंने कहा नहीं बेटा हम अकेले बनायेगे अन्यथा कभी सिर में भी दर्द होगा तो याद आवेगा कि स्थान निर्माण की अकेले ने बात की और मिलकर बनाया।
इसी धर्म संकट में हमने कहा कि आप मंदिर यहीं बनवा लो और हमारी भी प्रतिज्ञा है।
मंदिर निर्माण, प्राण प्रतिष्ठा पूर्ण होने पर अन्नग्रास होगा।
बस यही कारण रहा, प्राचीन स्थान श्री जगत पटैल ग्राम सेवास के पिताजी ने बनवाया और नया मंदिर निर्माण एवं माँ हनुमंता की नूतन प्राण प्रतिष्ठा पं. सुधीर चतुर्वेदी छुल्ला द्वारा की गई।
— माँ हनुमंता धाम प्रबंधन

आस्था का केंद्र, भक्ति का धाम।
— चार स्तंभ
वे सिद्धांत जो हमें प्रेरित करते हैं।
श्रद्धा
अटूट विश्वास ही हमारी नींव है। हर अनुष्ठान में भक्ति का भाव सर्वोपरि है।
समर्पण
गुरु चरणों में पूर्ण समर्पण, जो हमें सेवा के मार्ग पर निरंतर अग्रसर रखता है।
सेवा
निस्वार्थ भाव से जन-कल्याण और मंदिर की सेवा ही हमारा परम धर्म है।
पवित्रता
विचारों और कर्मों की शुद्धता, जो माँ हनुमंता धाम की गरिमा को बनाए रखती है।
धर्मिक पड़ाव
माँ हनुमंता धाम की स्थापना से लेकर आज तक की गौरवशाली यात्रा, जो श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है।
प्राण प्रतिष्ठा
विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा और मंदिर के दिव्य ऊर्जा का संचार।
भक्तों के अनुभव।
माँ हनुमंता धाम में कदम रखते ही मन को जो शांति मिलती है, वह अवर्णनीय है। यहाँ की ऊर्जा साक्षात दिव्य है।
गुरु जी का जीवन परिचय पढ़कर मन में भक्ति और सेवा का भाव जागृत हुआ। यह धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि प्रेरणा का केंद्र है। यहाँ की व्यवस्था और प्राण प्रतिष्ठा का इतिहास अत्यंत गौरवशाली है।
मंदिर निर्माण और यज्ञों का आयोजन जिस निष्ठा से यहाँ होता है, वह अद्भुत है। यह स्थान श्रद्धा का सच्चा प्रतीक है।
मेरे जीवन का सबसे सुखद अनुभव माँ हनुमंता धाम के दर्शन करना रहा है।