आधिकारिक गाथा
माँ हनुमंता धाम का भव्य मंदिर परिसर
धाम-दर्शन-01

माँहनुमंताधाम.

मुख्य विवरण
  • स्थानपवित्र धाम
  • संकल्पअटूट
  • प्रेरणागुरु जी
म ाँ हनुमंता धाम की स्थापना केवल ईंट-पत्थरों का निर्माण नहीं, बल्कि एक दिव्य संकल्प की सिद्धि है। जब हमने यहाँ की पावन भूमि पर कदम रखा, तो यहाँ केवल शांति और भक्ति का वास था। गुरु जी के मार्गदर्शन में, हमने इस स्थान को एक ऐसे तीर्थ के रूप में विकसित करने का बीड़ा उठाया जहाँ हर श्रद्धालु को साक्षात हनुमान जी की कृपा का अनुभव हो। यहाँ का हर कण, हर स्तंभ और हर नक्काशी हमारी अटूट श्रद्धा और समर्पण का प्रमाण है, जो आने वाली पीढ़ियों को धर्म और संस्कृति से जोड़े रखेगा।

ाँ हनुमंता धाम की स्थापना केवल ईंट-पत्थरों का निर्माण नहीं, बल्कि एक दिव्य संकल्प की सिद्धि है। जब हमने यहाँ की पावन भूमि पर कदम रखा, तो यहाँ केवल शांति और भक्ति का वास था। गुरु जी के मार्गदर्शन में, हमने इस स्थान को एक ऐसे तीर्थ के रूप में विकसित करने का बीड़ा उठाया जहाँ हर श्रद्धालु को साक्षात हनुमान जी की कृपा का अनुभव हो। यहाँ का हर कण, हर स्तंभ और हर नक्काशी हमारी अटूट श्रद्धा और समर्पण का प्रमाण है, जो आने वाली पीढ़ियों को धर्म और संस्कृति से जोड़े रखेगा।

§ II. प्राण प्रतिष्ठा

मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का वह क्षण हमारे लिए अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण था। वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ जब मूर्तियों में प्राण फूंके गए, तो पूरा वातावरण दिव्य ऊर्जा से भर उठा। गुरु जी के सानिध्य में संपन्न हुए इस महायज्ञ ने इस स्थान को एक जागृत तीर्थ बना दिया। हमने इस प्रक्रिया में हर छोटी-बड़ी बारीकी का ध्यान रखा ताकि मंदिर की गरिमा और पवित्रता अक्षुण्ण रहे। आज, यह धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भक्तों की आस्था का केंद्र है। कक्षा 10वीं में माता रानी का पंचक, आरती, प्रार्थना मन अनुरूप रचना की। कक्षा 11वीं गणित विषय से परीक्षा पास की और उसके बाद मन नहीं लगा घर पर ही आकर स्नातक (बी.ए) की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। शिक्षक बनने की यात्रा वर्ष 1984 में मिनी पी.एस.सी. परीक्षा का फार्म भरा और शिक्षक बनने की परीक्षा दी और दिनांक 01.12.1986 को परका सिमरिया में नियुक्ति आदेश प्राप्त हुआ। माता रानी की कृपा से हमारी नौकरी लग गई। नौकरी के वेतन का मासिक 20 प्रतिशत की राशि माता की सेवा में समर्पित थी। मन में एक प्रेरणा जागृत हुई कि यहाँ पर एक मंदिर बने प्रतिदिन झालर, शंख बजे नियमित पूजा हो, यह हमारा जीवन का लक्ष्य था। और हमने चैत्र की नवदुर्गा दशमी के दिन माँ के चबूतरा के समक्ष प्रतिज्ञा की। बहुत से दर्शनार्थी थे भक्तें हो रही थी सभी ने रोका की टगर पर यह कार्य असंभव है। पर हमने खड़े होकर कह दिया जब तक मंदिर का निर्माण नूतन प्राण प्रतिष्ठा नही होगी तब तक भोजन का परित्याग रहेगा। मंदिर निर्माण का संकल्प इसी बीच समय का चक्र चला। हमारे पिताजी संस्कृत आचार्य थे और श्रीमद्भागवत के मार्मिक विद्वान पं. भवानी शंकर पौराणिक छुल्ला वाले पंडित जी के नाम से जाने जाते थे। हमारे पिताजी ने मातारानी का संस्कृत में स्त्रोत की रचना की। पिताजी ने मंदिर निर्माण में मदद की और मेरा आत्मबल बढ़ाया। कुछ निकटतम ग्रामवासियों ने आर्थिक मदद की। बस फिर क्या था, कार्य निर्माण की रूपरेखा बनाई। हमारी प्रतिज्ञा में सम्मिलित श्री वृजमोन कम्पोन्डर बाबू ने एक माह तक भोजन नहीं किया। अनुरोध करने पर कम्पोण्डर बाबू ने भोजन किया। हमारा उपवास प्रतिज्ञाबद्ध चलता रहा। हमारे पास बजाज-50 गाड़ी थी। हम दोनों रामों में गये ग्राम खारोतला से 2700 रू0, सेवास से 360 रू0, कुमरई से 480 रू0, छुल्ला से 265 रू0, बांसा से 680 रू0 प्राप्त हुआ। वाहन ईधन अधिक व्यय होने से आना जाना बंद कर दिया। अब सब कुछ माताजी पर छोड़ दिया। ग्राम खारोतला राशि 2700 रू0 वर्तमान जिला पंचायत सदस्य संतोष पटैल के पिताश्री मल्ले पटैल के साथ सामग्री क्रय करने गढ़ाकोटा गये और प्राचीन स्थान चबूतरा पर कुछ खुदाई शुरू की ही थी कि एक और धर्मसंकट उत्पन्न हुआ। मंदिर निर्माण — श्री जगत पटैल का संकल्प श्री जगत पटैल ग्राम सेवास के पिताजी आये और कहने लगे बेटा तुम्हारे परिवार से पारिवारिक संबंध है, मंदिर निर्माण को रोक नहीं रहे पर बेटा तुम्हारा भाई जगत के जन्म में बोल दिया था कि हे माता हमारे यहाँ एक बच्चा हो जाए तो हम तुम्हारे स्थान पर मठ मन्दिर बनवा देंगे पर हमारी गलती हुई कि अब बच्चे की शादी होने के बाद भी मंदिर नहीं बनवा पाया। हमारी बोलना बदना है तो हमने कहा मिलकर मंदिर बना लेंगे। उन्होंने कहा नहीं बेटा हम अकेले बनायेगे अन्यथा कभी सिर में भी दर्द होगा तो याद आवेगा कि स्थान निर्माण की अकेले ने बात की और मिलकर बनाया। इसी धर्म संकट में हमने कहा कि आप मंदिर यहीं बनवा लो और हमारी भी प्रतिज्ञा है। मंदिर निर्माण, प्राण प्रतिष्ठा पूर्ण होने पर अन्नग्रास होगा। बस यही कारण रहा, प्राचीन स्थान श्री जगत पटैल ग्राम सेवास के पिताजी ने बनवाया और नया मंदिर निर्माण एवं माँ हनुमंता की नूतन प्राण प्रतिष्ठा पं. सुधीर चतुर्वेदी छुल्ला द्वारा की गई।

प्राण प्रतिष्ठा महायज्ञ का दृश्य
यज्ञ-अनुष्ठान-02
यज्ञ-अनुष्ठान-02 …. प्राण प्रतिष्ठा महायज्ञ, पावन धाम
§ III. केसरिया रंग

लोग अक्सर पूछते हैं कि हमने केसरिया और लाल रंगों को ही क्यों चुना। यह केवल रंग नहीं, बल्कि त्याग, वीरता और भक्ति के प्रतीक हैं। केसरिया रंग उस अग्नि का प्रतीक है जिसमें भक्त अपनी समस्त चिंताओं को समर्पित कर देता है। लाल रंग हनुमान जी की शक्ति और ऊर्जा का द्योतक है। हमने इन रंगों को इसलिए चुना ताकि यहाँ आने वाले हर श्रद्धालु को एक सकारात्मक ऊर्जा मिले और वे अपने भीतर के हनुमान को पहचान सकें। यह रंग हमारी पहचान और हमारे विश्वास का आधार हैं। जय माँ हनुमंता 🙏 स्थान: धाम गांजर क्षेत्र, ग्राम पंचायत सेवास, तह0 गढ़ाकोटा, जिला सागर (म0प्र0) सबसे पहले — माँ हनुमंता की प्रेरणा शक्ति जय माँ हनुमंता माँ प्रेरणा शक्ति द्वारा कथन, मातृ देवों भवः संसार में सभी प्राणियों के लिए मातृ भाव की महती महिमा है। मानव अपनी सबसे अधिक श्रद्धा स्वाभाविक रूप से माता-पिता के चरणों में अर्पित करता है क्योंकि जन्म से सर्वप्रथम माता अपनी गोद में लोक दर्शन कराती है, इसलिए मातृशक्ति ही आदि गुरू के रूप में प्रतिष्ठित है। माँ की करूणा और कृपा बालकों के लौकिक तथा परलौकिक कल्याण का आधार है इसलिए मातृदेवोभवः। शक्ति से रहित होना ही शून्यता है। शक्तिहीन पुरुष का कहीं भी आदर नहीं होता है। माँ की सेवा ही भक्ति है, और शक्ति का आधार है। प्रश्न बनता है कि “माँ हनुमंता” नाम कैसे पड़ा? दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के 108 नाम है। जिसमें एक नाम है “अहंता”। अहंकार को नष्ट करने वाली माँ “अहंता” अपभ्रंश में माँ “हनुमंता” हुआ। मायावी हनुदानव को खत्म करने वाली माँ हनुहन्ता, अपभ्रंश में माँ हनुमंता हो सकता है क्योंकि हनु दानव मायावी था अपने शरीर के करोड़ों रोमों को गाजर की तरह बड़ा लेता था, गाजर का अर्थ अस्त्र, भाला से आता है और माताजी के नाम से गांजर क्षेत्र है। प्रश्न बोधः — प्रेरणा शक्ति से चलो रामायण में चलते हैं। जब अहिरावण राम-लक्ष्मण को 70 हजार योजन नीचे पाताल पुरी ले गया था, उस समय हनुमंत लाल खोज करते गुरू, सूर्य विद्या का प्रयोग करके, पाताल पुरी पहुंच जाते हैं। हनुमंत लाल सोचने लगे, यह राक्षस नगरी बड़ी मायावी है। यदि हम यहाँ कोई भी सूक्ष्म रूप लेते हैं तो रामदूत के रूप में पहचाने जावेगें। हमें लंकगढ़ त्रिजटा जैसी पुर्नावृत्ति नहीं करना है। विचार मंथन किया और सोचा की देव, दानव रक्ष संस्कृति में जिस देवी, देवता की सामुहिक रूप से आस्था होती है, उसका परीक्षण नहीं होता। पाताल पुरी में अहिरावण राक्षसों सहित रक्षदेवी को प्रसन्न करने के लिए, महोत्सव मनाया और उसकी योजना राम-लक्ष्मण की बलि देने की थी। सभी राक्षस मदमस्त थे। नाच कूद रहे थे। उसी समय उस पाषाण मूर्ति को माँ शक्ति भेषधारी हनुमान स्वाद लेकर खाने लगे। सभी राक्षस प्रसन्न हुए की आज निकुम्ला देवी प्रत्यक्ष रूप से भोजन प्रसादी ले रही है। तब अहिरावण ने कहा, आज माता बहुत प्रसन्न है। चलो दोनों तपस्वियों की बलि देते हैं पर हमारा संविधान है कि मरने के पहले यदि किसी को रक्षा को बुलाना हो तो तुम्हे अल्प समय दिया जाता है। तब राम ने कहा माँ तो माँ होती है भले रक्षसंस्कृति की हो, बस अनुमति दें। हम तुम्हारी माँ की ममता को प्रणाम करना चाह रहे हैं। तब माँ शक्ति भेषधारी हनुमान ने सोचा कि यदि हमारे प्रभु प्रणाम करेंगे और हम आर्शीवाद का हाथ फैलायें हैं यह असंभव है, और यदि हथेली बंद करते हैं तो भेद खुल जावेगा। तभी हनुमंत लाल ने पराशक्ति का स्मरण किया कि हे माँ, सर्वशक्ति जहाँ भी हो तो हमारे शरीर में समावेशित हो जाओ, जिससे कुछ समय के लिए यह रहस्य ठहर जावेगा। माँ शक्ति समावेशित हुई और राम लक्ष्मण दोनों भाइयों ने प्रणाम किया। माँ शक्ति ने वरदहस्त किया तब राम ने कहा भाई लक्ष्मण माँ का वरदहस्त निष्फल नहीं होगा और प्रसन्न हुए। तभी हनुमंतलाल ने स्वयं स्वरूप में प्रकट होकर अहिरावण का वध किया और राम लक्ष्मण को लेकर पुनः वापस युद्ध स्थल में आये। अयोध्या पहुंचने पर बलि देने की बात माँ कौशिल्या को सुनाई तब माँ चौक गई और कहा बेटा फिर प्राण रक्षा किसने की और माँ हनुमान की तरफ देखने लगी तब राम ने कहा, हनुमान तो निमित्त थे वहाँ पर हनुमंत भेषधारी आदि शक्ति के आर्शीवाद से बचा, तो माँ कौशिल्या ने कहा जिस देवी शक्ति ने हमारे वंश की रक्षा की आज से रघुकुल में कुल देवी की तरह पूजीं जावेगी। हनुमान ने माँ का भेष लिया, और पराशक्ति का आव्हन किया। उसी समन्वय शक्ति का नाम माँ हनुमंता हुआ जो सभी ग्रामों में कुल देवी के रूप में पूजी जाती हैं। ऐसी प्रेरणा जागृत हुई। जय माँ हनुमंता धाम गांजर क्षेत्र ग्राम पंचायत सेवास, तह0 गढ़ाकोटा जिला सागर (म0प्र0) माँ हनुमंता धाम का इतिहास माँ हनुमंता देवी का स्थान प्राचीन है:- पॉच गॉव का मौजा रे, नहीं बस्ती दिखाय। बीच टगर पे बैंठी, हनुमंता मोरी माय।। प्राचीन समय में माँ हनुमन्ता देवी एक इमली वृक्ष के नीचे जड़ों में दबी हुई शिला पर बैठी थी। आसपास बहुत सारे बाने लगे हुए थे। माता जी, बड़ी माता, गांजर की खैरमाता नाम से जानी जाती थी। यह स्थान निर्जन था। वीरान ग्राम बेला, तोसकसी, पिपरिया, सेमरा, गांजर ग्राम टोला वीरान है। गांजर सेमरा ग्राम बासी कहा जाता है कि गांजर माता का इतिहास महोबा रियासत आल्हा ऊदल गांजर की लड़ाई से जुड़ा है। भानुप्रताप एक राजा थे, जो गढाकोटा के राजा मर्दन सिंह जू देव के निकटतम सम्बन्धी थे। जो पन्ना रियासत से संबंधित थे। गांजर की लड़ाई जो आल्हा खण्ड में मिलती है वहाँ के राजा के चचेरे भाई भानुप्रताप माताजी को साथ में लाये थे। “भानु प्रताप इक राजा रे, भारी तला तो खुदाय। खारो तला नाम राखों, गढ़कुअरपुर बसाय।। ” भानु प्रताप ने चार मानी यानी 16 एकड़ में तालाब खुदवाया था। जो माँ हनुमंता स्थान से पूर्व की तरफ एक किलोमीटर दूर है। वहाँ आज भी तालाब बाँध के पत्थर निकलते हैं और बांध के अवशेष प्राप्त हैं एवं पत्थर वहीं पड़े हुए हैं। इस तालाब का पानी खारा होने से खारोतला नाम पड़ा, महामारी एवं पानी की कमी के कारण गांजर, सेमरा ग्राम के वासी तालाब के निकट रहने लगे उस ग्राम का नाम वर्तमान में खारोतला ग्राम पड़ गया। गढ़कुअरपुर में भी बहुत प्राचीन मूर्तिं और गढ़ निर्माण के अवशेष मिलते हैं। गांजर खेर माता जो इमली वृक्ष के नीचे बैठी हैं। गाजर ग्रामवासियों द्वारा स्थापित ग्राम खारोतला अपनी माता को ले जाने लगे, सभी खारोतला वासियों ने पूजा-रचा प्रार्थना की और गाँव ले जाने लगे। माता जी के स्थान से मात्र डेढ़ किलोमीटर दूर ग्राम खारोतला है। बैलगाड़ी में बड़ी मेहनत से ग्रामवासियों ने गाजेबाजे के साथ माता की प्राचीन मूर्ति को बिठाया। बीच रास्ते में गाड़ी का पहिया, धुरा टूट गया तभी ग्रामवासियों ने पुनः माता जी को लेने गये, तो माता जी, टूटी गाड़ी में नहीं मिली और जब देखा तो इमली वृक्ष के नीचे बैठी मिली। सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। यह बात समुचित क्षेत्र में फैल गई तभी से सभी भक्तजन दर्शनों को आने लगे एवं पूजा-पाठ जवारे और भक्तें करने लगे। सभी की इच्छित मनोकामना पूर्ण होने लगी। माता का नाम माँ हनुमंता “बड़ी माता” के नाम से प्रसिद्धि पाई। ग्राम खारोतला के साथ समुचित क्षेत्र ग्राम के भक्तजन भंडारा, जवारे लेकर चैत्र की नवदुर्गा में आने लगे और बैशाख मास बाटियाँ, बैगन भर्ता, दाल बाटी का भंडारा करने लगे। यह माता जी का बहुत प्राचीन स्थान है। माताजी इमली वृक्ष के नीचे बैठी, तिन्डती, वृक्ष छायायां, शिला सिंहासन स्थितः।। ग्राम की सियानी बड़ी बऊ ने कुछ ईटों का चबूतरा बनवाया पूजा रचा प्रार्थना की – हे माँ, अब चबूतरा पर बैठ जाओ, क्योंकि इमली वृक्ष की जड़ों ने जहाँ माता बैठी थी उस शिला को ढक लिया, वह शिला आज भी विद्यमान है अब माता जी को ढक लेगी, इसलिए विशेष विनय प्रार्थना की। सियानी बऊ खारोतला, मढ़िया लिम्बरदार से संबंधित थी। आज भी मढ़िया लिम्बरदार के यहाँ से चैत्र दशमी को पान परसादी बहुत से ग्रामों की भक्तें बुलवाते थे और स्थान पर चलो शब्द कहना वर्जित था। चलो शब्द कहने से माँ को रूष्ठता थी। अब ग्राम खारोतला चलने की कोई हठ नहीं करता है। अब माँ प्रसन्न हैं अब चलो शब्द कहना वर्जित नहीं समय का परिवर्तन हुआ। “न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रीझ जाते हैं,”

“केसरिया रंग त्याग और भक्ति का प्रतीक है।”
§ IV. सेवा भाव

हमारा उद्देश्य केवल दर्शन कराना नहीं, बल्कि सेवा के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचना है। यहाँ होने वाले यज्ञ, भंडारे और सामाजिक गतिविधियाँ इसी सेवा भाव का हिस्सा हैं। हम पारदर्शिता और निष्ठा के साथ हर कार्य करते हैं। यदि कोई भक्त हमसे जुड़ना चाहता है, तो हम उन्हें पूरी जानकारी देते हैं। यहाँ कोई दिखावा नहीं है, केवल भक्ति है। हमारा हर प्रयास इस बात पर केंद्रित है कि श्रद्धालु यहाँ से शांति और आशीर्वाद लेकर जाए।

§ V. गुरु जी का मार्ग

गुरु जी का जीवन परिचय हमें सिखाता है कि तपस्या और सेवा ही जीवन का वास्तविक अर्थ है। उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर ही हमने इस धाम को इस भव्य स्वरूप में ढाला है। दिन-रात की मेहनत, अनगिनत चुनौतियाँ और भक्तों का अटूट विश्वास ही हमारी पूंजी है। हम जो कुछ भी करते हैं, वह गुरु जी के आशीर्वाद और हनुमान जी की प्रेरणा से करते हैं। यह धाम उन्हीं की कृपा का प्रतिफल है, जो आज लाखों भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। 1 — जन्म एवं प्रारंभिक जीवन मेरा जन्म 1961 में ग्राम छुल्ला (गढ़ाकोटा) में हुआ था। सन् 1972 में मैं कक्षा 5वीं पढ़ता था। रामसेवक विश्वकर्मा मासाब 5वीं में पढ़ाते थे। मासाब की दिनचर्या विलक्षण थी। ब्रम्ह मुहूर्त में कुँआ पर स्नान करने जाते थे और साथ में हमें भी ले जाते और फूल, दूर्वा, तोड़कर देते, और साथ में पूजा करते थे। मासाब श्री श्री श्री 1008 परमहंस दादा के भक्त थे। सदैव परमहंस दादा की सेवा में रत रहते थे। परमहंस दादा हमें बहुत चाहते थे। यहाँ PDF में अगली पंक्ति का कुछ हिस्सा स्कैन में कट/अस्पष्ट है, इसलिए उसे अपनी तरफ से बनाकर नहीं जोड़ना है। मूल PDF से ही रखना है। दादा का आशीर्वाद साथ में है। ग्राम रोन में दादा की समाधी मंदिर है। दादा की विलक्षण कृपा की अनुभूति आज भी होती है। 2 — माता रानी की कृपा जब मैं जन्म स्थान ग्राम छुल्ला में कक्षा छठवीं पढ़ता था। हमारे घर में ठाकुर बब्बा रहते थे वे मजदूरी करते थे। चैत्र की नवदुर्गा में ग्रामवासियों, भक्तजनों के जवारे, खप्पर लगाते थे। नवमी के दिन पंडा के साथ खप्पर जवारे लेकर माताजी के यहाँ आये। यहाँ पर एक इमली का वृक्ष, एक विकूत चबूतरा पर बैठी माँ हनुमंता माता, चारों तरफ पुंआर लगा हुआ था, निर्जन स्थान 03 कि0मी0 आसपास तक कोई गाँव नहीं है निकटतम ग्राम डेढ़ किलोमीटर दूर खारोतला है। ग्राम रोन-कुमरई, छुल्ला, मढ़िया, सेवास, फुलर, ऊटखेरा, कैकरा, मढ़िया बहुत से गाँव से जवारे भक्तें आती थीं। पानी का साधन नहीं था। एक छोटा तालाब और कुमरई ग्राम के बठा परिवार के दादा ने मांगकर कुआँ बनवाया था वही साधन था। यहाँ कोई चलो शब्द नहीं कहता था। बहुत से लोह के बाने, स्थान निर्जन भयभीत करने वाला था। जवारे खप्पर माँ को चढ़ाया कुछ भक्तों को भाव आने लगे और झूमने लगे। भय कारण मैंने वहाँ से घर आने के लिए खेतों में दौड़ लगा दी। बीच रास्ते में अधिक प्यास के कारण मूर्छित हो गया, जब होश आया तब एक कन्या सिर पर लाल कपड़ा बाँधे खप्पर में जल लिये मुझे पानी पिला रही थी और मुस्कराते हुए कहा ऐसे डरकर दौड़ नहीं लगाते। अकेले नहीं जाना चाहिए चलो हम छोड़ देते हैं। प्रसादी भी खिलाया थोड़ी दूर साथ में वह कन्या आई। गाँव के निकट जब आदमी दिखने लगे हमें अच्छा लगने लगा और जब पीछे मुड़कर देखा उस कन्या का दर्शन नहीं हुआ। बस यहीं से देवी माँ के चरणों में जुड़ने की शुरूआत हुई। जब घर पर सबको यह घटना बताई तो मेरी माँ ने कहा कि बेटा वह कन्या ही मातारानी थी। बस मेरा अनुराग माता रानी के प्रति बढ़ा और घर में आत्म चिन्तन करने लगा। बस क्या था, माता रानी के प्रति सेवा भक्ति की लगनशीलता बढ़ने लगी। हर त्यौहार दशहरा, दीपावली को जाकर चबूतरा की साफ-सफाई, लिपाई पुताई किया करता था। इस कार्य में हमारे सहयोगी सखा श्रीराम राय एवं लखन राय, बम्बू दादा सेवाभाव रखते थे। कक्षा 7वीं से हर दीपावली को रात्री में पूजन करते थे और स्थान पर रात्रि में ठहर जाते थे। वह आज भी नियम है। बहुत से आदमी कहने लगे कि इस बालक का दिमाग खराब हो जावेगा। जब देखो तब, अकेला माता जी के यहाँ इमली वृक्ष के नीचे बैठा रहता है। शिक्षा और माता रानी की कृपा छुल्ला ग्राम में कक्षा आठवीं पास की और आगे पढ़ने के लिए दमोह चला गया। सप्ताह में एक बार साईकिल से दर्शन करने आता था। कक्षा 10वीं में माता रानी का पंचक, आरती, प्रार्थना मन अनुरूप रचना की। कक्षा 11वीं गणित विषय से परीक्षा पास की और उसके बाद मन नहीं लगा घर पर ही आकर स्नातक (बी.ए) की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। शिक्षक बनने की यात्रा वर्ष 1984 में मिनी पी.एस.सी. परीक्षा का फार्म भरा और शिक्षक बनने की परीक्षा दी और दिनांक 01.12.1986 को परका सिमरिया में नियुक्ति आदेश प्राप्त हुआ। माता रानी की कृपा से हमारी नौकरी लग गई। नौकरी के वेतन का मासिक 20 प्रतिशत की राशि माता की सेवा में समर्पित थी। मन में एक प्रेरणा जागृत हुई कि यहाँ पर एक मंदिर बने प्रतिदिन झालर, शंख बजे नियमित पूजा हो, यह हमारा जीवन का लक्ष्य था। और हमने चैत्र की नवदुर्गा दशमी के दिन माँ के चबूतरा के समक्ष प्रतिज्ञा की। बहुत से दर्शनार्थी थे भक्तें हो रही थी सभी ने रोका की टगर पर यह कार्य असंभव है। पर हमने खड़े होकर कह दिया जब तक मंदिर का निर्माण नूतन प्राण प्रतिष्ठा नही होगी तब तक भोजन का परित्याग रहेगा। मंदिर निर्माण का संकल्प इसी बीच समय का चक्र चला। हमारे पिताजी संस्कृत आचार्य थे और श्रीमद्भागवत के मार्मिक विद्वान पं. भवानी शंकर पौराणिक छुल्ला वाले पंडित जी के नाम से जाने जाते थे। हमारे पिताजी ने मातारानी का संस्कृत में स्त्रोत की रचना की। पिताजी ने मंदिर निर्माण में मदद की और मेरा आत्मबल बढ़ाया। कुछ निकटतम ग्रामवासियों ने आर्थिक मदद की। बस फिर क्या था, कार्य निर्माण की रूपरेखा बनाई। हमारी प्रतिज्ञा में सम्मिलित श्री वृजमोन कम्पोन्डर बाबू ने एक माह तक भोजन नहीं किया। अनुरोध करने पर कम्पोण्डर बाबू ने भोजन किया। हमारा उपवास प्रतिज्ञाबद्ध चलता रहा। हमारे पास बजाज-50 गाड़ी थी। हम दोनों रामों में गये ग्राम खारोतला से 2700 रू0, सेवास से 360 रू0, कुमरई से 480 रू0, छुल्ला से 265 रू0, बांसा से 680 रू0 प्राप्त हुआ। वाहन ईधन अधिक व्यय होने से आना जाना बंद कर दिया। अब सब कुछ माताजी पर छोड़ दिया। ग्राम खारोतला राशि 2700 रू0 वर्तमान जिला पंचायत सदस्य संतोष पटैल के पिताश्री मल्ले पटैल के साथ सामग्री क्रय करने गढ़ाकोटा गये और प्राचीन स्थान चबूतरा पर कुछ खुदाई शुरू की ही थी कि एक और धर्मसंकट उत्पन्न हुआ। मंदिर निर्माण — श्री जगत पटैल का संकल्प श्री जगत पटैल ग्राम सेवास के पिताजी आये और कहने लगे बेटा तुम्हारे परिवार से पारिवारिक संबंध है, मंदिर निर्माण को रोक नहीं रहे पर बेटा तुम्हारा भाई जगत के जन्म में बोल दिया था कि हे माता हमारे यहाँ एक बच्चा हो जाए तो हम तुम्हारे स्थान पर मठ मन्दिर बनवा देंगे पर हमारी गलती हुई कि अब बच्चे की शादी होने के बाद भी मंदिर नहीं बनवा पाया। हमारी बोलना बदना है तो हमने कहा मिलकर मंदिर बना लेंगे। उन्होंने कहा नहीं बेटा हम अकेले बनायेगे अन्यथा कभी सिर में भी दर्द होगा तो याद आवेगा कि स्थान निर्माण की अकेले ने बात की और मिलकर बनाया। इसी धर्म संकट में हमने कहा कि आप मंदिर यहीं बनवा लो और हमारी भी प्रतिज्ञा है। मंदिर निर्माण, प्राण प्रतिष्ठा पूर्ण होने पर अन्नग्रास होगा। बस यही कारण रहा, प्राचीन स्थान श्री जगत पटैल ग्राम सेवास के पिताजी ने बनवाया और नया मंदिर निर्माण एवं माँ हनुमंता की नूतन प्राण प्रतिष्ठा पं. सुधीर चतुर्वेदी छुल्ला द्वारा की गई।

गुरु जी का आशीर्वाद
गुरु-आशीर्वाद-03
गुरु-आशीर्वाद-03 …. गुरु जी का पावन सानिध्य
§ VI.

यदि आप माँ हनुमंता धाम आते हैं, तो हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि यहाँ आपको वह शांति मिलेगी जिसकी आप तलाश कर रहे हैं। हमारा प्रबंधन और सेवादार हमेशा आपकी सहायता के लिए तत्पर हैं। यह धाम आपका अपना है। हम यहाँ केवल व्यवस्थापक हैं, असली मालिक तो हनुमान जी हैं। हमारा वादा है कि हम इस पवित्र स्थान की मर्यादा और सेवा की गुणवत्ता को हमेशा बनाए रखेंगे, ताकि हर भक्त को यहाँ अपनापन महसूस हो।

§ VII. निमंत्रण

मैं आप सभी को माँ हनुमंता धाम आने का सादर निमंत्रण देता हूँ। यहाँ आकर आप स्वयं उस दिव्य ऊर्जा का अनुभव करें जो इस स्थान को अद्वितीय बनाती है। गुरु जी के सानिध्य में बैठकर हनुमान जी की भक्ति में लीन होना एक अलौकिक अनुभव है। हमारा द्वार हर उस भक्त के लिए खुला है जो श्रद्धा और विश्वास के साथ आता है। आइए, इस पावन यात्रा में हमारे साथ जुड़ें और अपने जीवन को धन्य बनाएं। जय श्री राम, जय हनुमान।

धाम विवरण
  • इतिहासविस्तृत
  • दर्शननित्य
  • संपर्क 9993948900 सदासदा

03 — ऐतिहासिक यात्रा

दशकों का
/ पावन सफर।

  1. 12 / जनवरी 2

    1990

    संकल्प की नींव

    माँ हनुमंता धाम की स्थापना एक दिव्य संकल्प के साथ हुई, जिसका उद्देश्य सनातन धर्म की सेवा और हनुमान जी की भक्ति का प्रसार करना था।

  2. 22/APRIL/1992

    1992

    प्राण प्रतिष्ठा

    विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मंदिर में विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई, जिससे यह स्थल एक जागृत तीर्थ बन गया।

  3. 1993

    प्रथम महायज्ञ

    विश्व कल्याण और शांति के लिए भव्य महायज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें हज़ारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य लाभ अर्जित किया।

  4. 08 / नवंबर

    2021

    विस्तार एवं विकास

    श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए मंदिर परिसर का विस्तार किया गया, जिसमें ध्यान केंद्र और सेवा सदन का निर्माण शामिल है।

  5. 17 / फरवरी

    2023

    सांस्कृतिक केंद्र

    मंदिर अब केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और धर्म के संरक्षण का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है।

  6. वर्तमान

    2025

    सेवा एवं समर्पण

    आज माँ हनुमंता धाम निरंतर सेवा कार्यों, धार्मिक अनुष्ठानों और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के माध्यम से समाज को नई दिशा दे रहा है।

  7. ——

    —-

    अगला अध्याय — निरंतर जारी

[ 03 / धाम यात्रा ]

निर्माण के
पावन चरण

संकल्प से सिद्धि तक की दिव्य गाथा।

[ 01 ]/ धाम

मंदिर
निर्माण

माँ हनुमंता धाम का भव्य वास्तु-शिल्प, जो प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला और आधुनिक इंजीनियरिंग का एक अद्भुत संगम है।

[ 02 ]/ धाम

प्राण
प्रतिष्ठा

विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुई प्राण प्रतिष्ठा, जिसने इस पावन स्थल को दिव्य ऊर्जा से भर दिया।

[ 03 ]/ धाम

सतत
विकास

श्रद्धालुओं की सुविधा और धाम की गरिमा को बढ़ाने के लिए निरंतर जारी निर्माण कार्य और सेवा प्रकल्पों का विवरण।

माँ हनुमंता धाम

भक्ति और आस्था का पावन केंद्र।

सनातन धर्म सेवा संस्थान

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